उत्तराखंड में 90 फीसदी स्कूल मुखिया विहीन, फोर्थ क्लास से प्रिंसिपल तक सब शिक्षकों के हवाले

उत्तराखंड में सरकारी स्कूलों की दशा किसी से छिपी नहीं है. जर्जर भवनों से लेकर शिक्षकों की कमी और छात्रों की कम होती संख्या का मुद्दा अक्सर सामने आता रहा है, लेकिन विश्व शिक्षक दिवस पर आज बात शिक्षकों के उस दर्द की, जो छात्रों के भविष्य से भी जुड़ा हुआ हैं. यहां 90 फीसदी मुखिया विहीन विद्यालयों में शिक्षकों को ही हर मर्ज की दवा मानकर न केवल शिक्षकों के भविष्य बल्कि, छात्रों के शैक्षणिक कार्यों को दांव पर लगाया गया है.

बता दें कि शिक्षा के मंदिर में शिक्षक की भूमिका भगवान से भी ऊपर माना जाता है. ‘गुरु गोविंद दोउ खड़े, काके लागू पाय’ दोहा बच्चों को इसी भाव के साथ पढ़ाया और समझाया भी जाता है, लेकिन उत्तराखंड में सड़कों पर उतरे शिक्षक न तो खुद को और ना ही उस भाव के साथ न्याय कर पा रहे हैं.

दरअसल, सरकारों ने शिक्षा व्यवस्था को इतना पेचीदा कर दिया है कि शिक्षकों का हाल विद्यालय में हर मर्ज की दवा जैसा हो गया है. चतुर्थ श्रेणी से लेकर प्रधानाचार्य तक के काम की जिम्मेदारी शिक्षकों पर ही छोड़ दी गई है. इन स्थितियों के पीछे की कई वजह हैं, लेकिन इनमें सबसे ज्वलंत मुद्दा शिक्षकों के प्रमोशन का है.

जिसको लेकर हजारों शिक्षक पिछले दिनों सड़कों पर भी दिखाई दिए थे. यह शिक्षकों का दर्द ही है कि आज उन्हें सालों की सेवाएं देने के बाद भी प्रधानाचार्य पद पर प्रमोशन नहीं मिल पा रहा है. सरकार इसके पीछे न्यायिक वजह बताती है, लेकिन कुछ भी हो पीस तो शिक्षक ही रहा है.

सरकारी शिक्षक के रूप में पिछले करीब 35 साल से सेवाएं दे रहे एसएस दानू भी उसी मनोदशा से गुजर रहे हैं, जिसे राज्य के कई वरिष्ठ शिक्षक महसूस कर रहे हैं. रसायन विज्ञान में प्रवक्ता एसएस दानू इतने सालों की सेवाएं देने के बाद भी प्रधानाचार्य पद पर प्रमोशन नहीं ले पाए हैं. जबकि, अब अगले कुछ सालों में उनकी सेवानिवृत्ति होने जा रही है.

खास बात ये है कि अपनी इतने सालों की सेवाओं में 15 साल तक उन्होंने प्रभारी प्रधानाचार्य के रूप में भी कार्य किया है, लेकिन उन्हें इस बात का मलाल है कि सेवानिवृत्ति नजदीक होने के बावजूद अब तक वो प्रधानाचार्य पद पर प्रमोशन नहीं ले पाए हैं. ईटीवी भारत पर उन्होंने अपनी बात रखी.

सालों की सेवाएं देने के बाद सर्वोच्च पद तक पहुंचकर सेवानिवृत्ति का सपना हर कोई देखता है, लेकिन शिक्षा विभाग में शिक्षक भर्ती होने के बाद बिना पदोन्नति के ही सेवानिवृत्ति की दहलीज तक पहुंच रहा है. यही शिक्षक जब बाकी विभागों में चयनित होने वाले अपने साथियों को तमाम प्रमोशन के बाद उच्चस्थ पद पर देखता है तो उसका दर्द और भी गहरा हो जाता है.

ऐसे वरिष्ठ शिक्षकों का जख्म सरकारी सिस्टम तब और भी गहरा कर देता है जब उनकी एसीआर (Annual Confidential Report) जल्द प्रमोशन होने के नाम पर विद्यालयों से मंगाई जाती है, लेकिन यह प्रक्रिया प्रमोशन तक नहीं पहुंच पाती. प्रधानाचार्य के पद पर रिक्तियों के आंकड़ों से यदि हम प्रदेश की शैक्षणिक स्थिति को समझना चाहे तो ये हालात भी काफी हैरान करने वाले हैं.




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